विनय पत्रिका के माध्यम से तुलसीदास का दार्शनिक चिंतन
यशवंत कुमार साव
सहा- प्राध्यापक ¼ हिन्दी ½ शासकीय महाविद्यालय अरमरीकला] जिला-बलोद] छत्तीसगढ़।
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ABSTRACT:
तुलसी दर्शन ग्रंथों के विवाद में न पड़कर अज्ञान रूपी अंधकार को, ज्ञान भक्ति के माध्यम से अद्वैत के दर्शन का मार्ग प्रशस्त करते हैं। जगत् मृगतृष्णा के जल के समान असत्य है। जीव भ्रमवश जगत् में आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक तापों से व्याकुल है। इन तीन तापों से मुक्ति केवल राम की भक्ति से मिल सकती है। राम ब्रह्म हैं जो लीला करने प्रकट होते हैं और प्रेम के वशीभूत होकर भक्तों का कल्याण करते हैं। कलयुग में जहाँ ज्ञान, भक्ति, परोपकार और धर्म धनलाभ का विषय हो गया है लोग सच्चे हृदय से भक्ति करने के स्थान पर कपट पूर्वक भक्ति कर रहे हैं। जिस प्रकार तोता पढ़ता है किन्तु उसे ज्ञान नहीं होता वैसे ही वे शस्त्रों को केवल पढ़ने से परमात्मा के दर्शन नहीं हो सकते। परमात्मा के द्वार ऊंच-नीच, अमीर गरीब सभी के लिए खुले हैं किन्तु वह द्वार प्रेम, विष्वास, श्रद्धा, समर्पण के साथ भक्ति करने से ही खुल सकता है। मनुष्य आज काम, क्रोध, मोह, लोभ, मद, अहंकार के वश में होकर लूटमार, अन्याय, अत्याचार, व्यभिचार, अनाचार में लिप्त हो गया है। लोक में विश्वास, प्रेम, धर्म की, और कुल की मर्यादा का अभाव है। संसार वर्ण और आश्रम धर्म से विहीन हो गया है लोक और वेद दोनों की मर्यादा चली गयी है। परमार्थ स्वार्थ में परिणत हो गया है, और मोक्ष का साधन ज्ञान आज पेट भरने का साधन हो रहा है। इस प्रकार कर्म, उपासना, ज्ञान तीनों की ही बुरी दशा है। करनी कुछ भी नहीं केवल कथनी है। वाणी और आचरण में विषमता है। तुलसीदास का मानना है कलिकाल के दुखों से मुक्ति के लिए, एक मात्र राम नाम कल्पवृक्ष के समान हैं। मुनियों के अनेक मत हैं दर्शन और पुराणों में नाना प्रकार के पंथ देखकर झगड़ा ही जान पड़ता है। जीव यदि बिना योग, यज्ञ, व्रत और संयम के संसार सागर से पार जाना चाहता है तो राजमार्ग के समान राम भजन ही उत्तम है। ब्राह्मण, देवता, गुरु, हरि और संतों की कृपा से संसार सागर को पार किया जा सकता है।
KEYWORDS: तुलसीदास, विनयपत्रिका, राम, दर्शन, जीव, माया, जगत्, भक्ति, प्रेम, अवतार।
प्रस्तावना:-
तुलसीदास हिन्दी साहित्य के इतिहास में भक्तिकाल के कवि हैं। ”भक्तिकाल से तात्पर्य उस काल से है जिसमें मुख्यतः भागवत् धर्म के प्रचार तथा प्रसार के परिणामस्वरूप भक्ति-आंदोलन का सूत्रपात हुआ था और उसकी लोकोन्मुखी प्रवृत्ति के कारण धीरे-धीरे लोक-प्रचलित भाषाएं भक्ति-भावना की अभिव्यक्ति का माध्यम बनती गईं।”1 इस काल की रचनाएं अलौकिक शक्ति या परमतत्व को समर्पित है। इस काल में दृ“कालदर्शी भक्त कवि जनता के हृदय को संभालने और लीन रखने के लिए दबी हुई भक्ति को जगाने लगे। क्रमशः भक्ति का प्रवाह ऐसा विकसित और प्रबल होता गया कि उसकी लपेट में केवल हिन्दू जनता ही नहीं, देश में बसने वाले सहृदय मुसलमानों में से भी न जाने कितने आ गये।”2 प्रवृत्ति के आधार पर भक्तिकाल के कवियों को दो वर्गों में विभाजित किया गया है- सगुण और निर्गुण। पुनः इन दोनों धाराओं को दो-दो शाखाओं मे विभाजित किया गया है। निर्गुण धारा के अंतर्गत ज्ञानाश्रयी शाखा और प्रेमाश्रयी शाखा है तथा सगुण के अंतर्गत रामकाव्य एवं कृष्ण काव्य है। तुलसीदास रामकाव्य परंपरा के प्रतिनिधि कवि हैं। नगेन्द्र ने भक्तिकाव्य का साध्य लोकोत्तर अनुभूति को माना है-“भक्ति-साहित्य किसी क्षणिक भावावेश अथवा इंद्रियजन्य भावोन्माद की अभिव्यक्ति-मात्र नहीं है, अपितु यह ठोस तथा उर्वर धरातल की उपज है। इसके साधन लौकिक अवश्य है, किन्तु इसका साध्य एक ऐसी लोकोत्तर अनुभूति है जिससे भक्त के चित्त को अनुपम शांति और आनंद की उपलब्धि होती है।”3 तुलसीदास को सगुण धारा के अंतर्गत रामकाव्य के अंतर्गत स्थान दिया जाता है किन्तु उन्होंने अपने काव्य मे राम को सगुण और निर्गुण दोनों रूपों में स्वीकार किया है। राम सगुण और निर्गुण दोनों हैं तथा समस्त दृश्य रूप संसार और उसके द्रष्टा भी हैं-
“सिद्ध-साधक-साध्य-, वाच्य-वाचकरूप, मंत्र-जापक-जाप्य, सृष्टि-स्रष्टा।
परम कारण, कंजनाभ, जलदाभतनु,सगुण, निर्गुण, सकल दृष्य-द्रष्टा ।।”4
दर्शन शब्द का अर्थ बाह्य-जगत को देखने से न होकर अंतस के दर्शन है। मानव का चंचल मन भौतिक संसाधनों के माध्यम से सुख प्राप्त करना चाहता है, किन्तु मन चंचल होने के कारण और अधिक की मांग करता है। परिणामस्वरूप वह संतुष्ट न होकर दुखी हो जाता है। यही दुख मनुष्य को अंतसयात्रा की ओर प्रेरित करता है। वह अपने अनुभव से बाह्य जगत से दुखी होकर भीतर के सत्य की खोज में निकल पड़ता है। वह शाष्वत सत्य के दर्शन करना चाहता है। इस दृष्टि से ज्ञान तथा सत्य की खोज करना, उसके वास्तविक स्वरूप को समझने की कला को ‘दर्शन’ कहते हैं। “किसी वस्तु के तात्विक अर्थात् सच्चे स्वरूप को जान लेना ही दर्शन शब्द का प्रयोजन माना गया है। यह दृश्यमान चराचर विश्व सत्य है कि मिथ्या है, जड़ है कि चेतन है, प्रकाश है कि अंधकार है, सुख-दुख आदि के द्वन्द्व से रहित है अथवा सहित है, इत्यादि विषयों का विचार भी दर्शन शब्दार्थ के अंतर्गत माना गया है।”5 “आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक इन तीन प्रकार के दुरूखों का आत्यन्तिक नाश एवं अखंड आनंद की प्राप्ति भारतीय दर्शन का लक्ष्य है।”6 तुलसीदास ने विनय पत्रिका में दार्शनिक तत्व जीव, ब्रह्म, माया, जगत् त्रिताप का वर्णन करने के साथ ही जीव का संसार सागर से मुक्ति के लिए भक्ति का सहज मार्ग प्रदर्शित किया है।
त्रिताप- तुलसीदास ने विनय पत्रिका में संसारजनित दुखों से मुक्ति के लिए राम की भक्ति को एक मात्र औषधि एवं अद्वैतदर्शी भक्त को वैद्य कहा है। राम ही आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक तापों को हारने वाले एवं ज्ञान के मार्ग में बाधक संदेह, शोक, अज्ञान तथा भय का नाश करने वाले हैं। अज्ञान रूपी निद्रा से जागकर ज्ञान रूपी परमात्मा के दर्शन् प्राप्त होने पर तीनों ताप नष्ट हो जाते हैं-
“त्रिबिधताप-संदेह-शोक-संसय-भय-हारि।।”7
संसार के असत्य होने पर भी जगत् में मृग तृष्णा के जल की भांति भ्रमवश दुःखों का अनुभव होता है। परमात्मा के तत्त्वज्ञान में जागे बिना दुःखों से मुक्त नहीं हो सकता। जो सम, संतोष, दया और विवेक से युक्त व्यवहार करते हैं। राम की भक्ति और संतों की संगति से अज्ञान का नाश हो जाता है, संसारजनित दुःखों से मुक्ति मिल जाती है-
“जो जग मृषा ताप-त्रय-अनुभव होइ कहहु केहि लेखे।
कहि न जाय मृगबारि सत्य, भ्रम ते दुख होइ बिसेखे ।।”8
राम की भक्ति सुलभ और सुखदायिनी है। वह संसार के तीनों ताप, शोक और भय को हरने वाली है। किन्तु वह भक्ति सत्संग के बिना प्राप्त नहीं होती; और संत तभी मिलते है जब रघुनाथ कृपा करते हैं। संतों के दर्शन स्पर्श और सत्संग से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं सुख-दुःख में समबुद्धि हो जाते है अनेक सद्गुण प्रकट हो जाते हैं तथा भलीभाँति परमात्मा का बोध हो जाने के कारण मोह, लोभ, शोक, क्रोध आदि सहज ही दूर हो जाते हैं-
“रघुपति-भगति सुलभ-सुखकारी। सो त्रयताप-सोक-भय-हारी।।
बीनू सतसंग भगति नहिं होई। ते तब मिले द्रवै जब सोई।।”9
मनुष्य यदि मन में प्रेम और विश्वास के साथ राम नाम की ज्योति जला लेता है तो वह तीनों तापों से कभी नहीं जलता अर्थात् वह सांसारिक पीड़ा से मुक्त होकर परम आनंद का अनुभव करता है-
“जो मन, प्रीति-प्रतीतिसों राम-नामहिं रातो। तुलसी रामप्रसादसों तिहुँताप न तातो।।”10
राम - राम सत्, चेतन, व्यापक, आनंदरूप पारब्रह्म है जो लीला करने के लिये अव्यक्त से व्यक्त रूप में प्रकट हुए हैं। ब्रह्म आदि सब देवता और सिद्धगण को दानवों के अत्याचार से मुक्ति प्रदान करने के लिए निर्मल गुण सम्पन्न नर-शरीर धारण किया है-
“सच्चिदव्यापकानंद पारब्रह्म-पद विग्रह व्यक्त लीलावतारी।
विकल ब्राहमादि, सुर, सिद्ध, संकोचवश, विमल गुण-गेह नर-देह-धारी।।”11
तुलसीदास राम भक्त हैं लेकिन उनके राम केवल दशरथ पुत्र नहीं हैं वे जानकीनाथ राग-द्वेष रूपी अंधकार का नाश करने वाले सच्चिदानंद, आनंदकंद की खानि संसार को शांति देने वाले परम सुंदर हैं-
“जानकीनाथ, रघुनाथ, रागादि-तम-तरणि, तरुण्यतनु, तेजधामं।
सच्चिदानंद, आनंदकंदाकरं, विष्व विश्राम, रामाभिरामं।।”12
राम शुद्ध, शांत, अत्यंत निर्मल, ज्ञान स्वरूप, क्रोध और मद का नाश करने वाले तथा करुणा के स्थान हैं अजेय, उपाधिरहित, मन, इंद्रियों से परे, अव्यक्त, व्यापक, एक, निर्विकार अजन्मा एवं अद्वितीय हैं। परमात्मा होकर भी प्रकृति को साथ लेकर प्रकट होने वाले हैं-
“अजित, निरुपाधि, गोतीतमव्यक्त, विभुमेकमनवद्यमजमद्वितीयं।
प्राकृतं, प्रकट परमातमा, परमहित, प्रेरकानंद वंदे तुरीयं।।”13
राम पूर्ण आनंद की राशि, अविवेक, अज्ञान और सत्त्व, रज, तम, गुणों के त्रिदोष को हरने वाले हैं। मूल प्रकृति, महत्ततत्त्व, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध, तीनों गुण, पाँच तत्व, दसों इंद्रियाँ, पँच प्राण, चित्त, आत्मा, काल, परमाणु और महान् चैतन्य-शक्ति सभी कुछ आपका ही रूप है-
“प्रकृति, महत्ततत्त्व, शब्दादि गुण, देवता व्योम, मरूदग्नि, अमलांबु, उर्वी।
बुद्धि, मन, इंद्रिय, प्राण, चित्तात्मा, काल, परमाणु, चिच्छक्ति गुर्वी ।।”14
राम परमात्मा शुद्ध ब्रह्म होकर भी भक्तों के लिए मनुष्यरूप धारण करके प्रकट हुए, जिन्होंने अभी तक मत्स्य, शूकर, कच्छप, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध का रूप धारण कर अपने भक्तों का उद्धार कर चुके हैं। कलिकाल में पापों से सभी मनुष्यों का मन मलिन हो चुका है। कलिकाल के अज्ञान के नाश के लिए राम विष्णुयश नामक ब्राह्मण के यहाँ पुत्र रूप में कल्कि-अवतार धारण करेंगे-
“कालकलिजनित-मल-मलिनमन सर्व नर मोह-निशि-निबिड़यवनांधकारं।
विष्णुयश पुत्र कलकी दिवाकर उदित दासतुलसी हरण विपत्तिभारं ।।”15
जगत् - यह संसार परमात्मा की माया से निर्मित है जो केवल देखने से सुंदर है विचार करने पर इसकी असत्यता का बोध हो जाता है। यह जगत् केले के पेड़ की भांति है जिसके विचार रूपी छिलके उतारने पर अंदर कुछ भी प्राप्त नहीं होता। परमतत्व का बोध होने संसार की निस्सारता प्रकट हो जाती है। कोई इस संसार को सत्य कहता है कोई मिथ्या बतलाता है और कोई सत्य, मिथ्या से मिला हुआ मानता है तुलसीदास के अनुसार ये तीनों ही भ्रम है यह सब परमात्मा की लीला है-
“कोउ कह सत्य, झूठ कह कोऊ, जुगल प्रबल कोउ मानै।
तुलसिदास परिहरै तीन भ्रम, सो अपन पहिचानै।।”16
यह जगत् भ्रम से आकाश में फले-फूले दिखने वाले बगीचे के समान सर्वथा मिथ्या है। वेद, गुरु, संत और स्मृतियाँ सभी एव स्वर से कहती हैं कि यह दृश्यमान जगत् असत् और दुःख रूप है-
“राम-नाम ही सों अंत सब ही को काम रे।
जग नभ-बाटिका रही है फलि फूलि रे।।”17
माया- माया का सारा प्रपंच एवं जीव के दोष, गुण, कर्म और काल सब परमात्मा राम के हाथ में ही है। और जीव का परमात्मा से मिलन होता है जब मनुष्य को अपने हृदय में हरि के दर्शन होते है तब भेदरूपी माया नष्ट हो जाते है तब जीव और परमात्मा एक हो जाते हैं-
“नाथ हाथ माया-प्रपंच सब, जीव-दोष-गुन-करम-कालु।”18
पशुपालक ग्वाले की तरह परमात्मा जीव रूपी पशुओं को अज्ञान से बांधता है, ज्ञान से खोलता है, और कर्मों में जोतता है। अर्थात् जिस प्रकार पशुओं पर सम्पूर्ण नियंत्रण ग्वाले का होता है वैसे ही जीव भी परमात्मा के हाथ के कठपुतली है। जीव संसार को मृगतृष्णा के जल के समान सत्य मानकर अज्ञान, मोह, लोभ, अंहकार, मद, क्रोध, और ज्ञान का शत्रु काम के वशीभूत हो जाता है। जीव आनंदस्वरूप है उसका निवास आनंदसागर में है किन्तु वह मृगजल को सुख समझकर मग्न हो रहा हैं। जिस प्रकार मृगतृष्णा के जल को मथकर घी प्राप्त नहीं हो सकता उसी प्रकार सांसारिक विषय-भोग से सच्चा सुख नहीं मिल सकता है। जीव सच्चिदानंद स्वरूप को भ्रमवश भूलकर जगत् में अपने को माया से बाँध लेता है और दुःखी होता है।
“मायाबस स्वरूप बिसरायो द्य तेहि भ्रमतें दारुन दुख पायो।।”19
सदा स्त्री,-पुत्र-धन- और मकान आदि की ममता रूपी रात्रि में अचेत सोते रहता है। महापापी होने पर भी लोगों के मुख से पुण्यात्मा कहलाना चाहता हूँ दूसरों के धूल के कण के समान पाप को सुमेरूपर्वत और गुणों को धूल के समान तुच्छ बतलाकर तिरस्कार करता हूँ।
“नहिं सतसंग भजन नहिं हरिको, स्रवन न राम कथा अनुरागी।
सुत-बित-दार-भवन-ममता-निसि सोवत अति, न कबहुँ मति जागी।।”20
जगत् में जीव के कर्म, काल, स्वभाव, गुण-दोष- ये सभी परमात्मा की माया है। माया का सारा समाज शतरंज के समान काठ का बना हुआ असत्य है। यह बाजी परमात्मा ने रची है जिसमें जीत और हार भी उन्हीं के हाथ में है-
“सतरंजको सो राज, काठको सबै समाज, महाराज बाजी रची, प्रथम न हति।
तुलसी प्रभु के हाथ हारिबो-जीतिबो नाथ !”21
राम कृपा के बिना माया से मुक्ति नहीं मिल सकती है, जैसे रात के समय केवल दीपक की बातें करने से अँधेरा दूर नहीं होता। वैसे ही कोई वाचक ज्ञान में कितना निपुण क्यों न हो, संसार सागर को पार नहीं कर सकता। कामधेनु और कल्पवृक्ष के चित्र से विपत्ति नहीं मिटती उसी प्रकार केवल शस्त्रों की बातें करने से मोह नहीं मिटता।
रामनाम - तुलसीदास कहते हैं कि राम का नाम लेने से ऊसर खेत भी उपजाऊ हो जाता है अर्थात् जिसके अंदर सुख का लेश मात्र भी नहीं है वह भी राम नाम का जाप कर भक्ति ज्ञान को प्राप्त कर परम आनंद का लाभ प्राप्त कर सकता है। इस कलियुग में योग-यज्ञ आदि दूसरे साधन अंधेरा दूर करने के लिए चित्रलिखित सूर्य के समान व्यर्थ है। कलिकाल में राम नाम के सिवा वैराग्य, योग, यज्ञ, तप और दान से कुछ नहीं हो सकता। रामनाम महामणि है, कल्पवृक्ष है यह अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारों फल देता है। कलि न बिराग, जोग, जाग, तप त्याग रे। राम नाम के प्रभाव से वैराग्य, योग, जप, तप आदि आप ही जागृत हो जाते है और सभी कर्म क्षीण हो जाते हैं-
“राम नाम महामनि, फनि जगजाल रे। राम-नाम कामतरु देत फल चारि रे।।”22
धर्मरूपी कल्पवृक्ष का बगीचा, भक्ति, वैराग्य, विज्ञान, सम, दम, दान, आदि मोक्ष के अनेक साधन-सभी इस राम नाम के अधीन है-
“धर्म-कल्पद्रुमाराम, हरिधाम-पथि संबलं, मूलमिदमेव एकं।
भक्ति-वैराग्य-विज्ञान-साम-दान-दम, नाम आधीन साधन अनेकं।।”23
स्वर्ग, नरक, चर, अचर और बहुत से लोक इस मन में रहते हैं। भक्ति रूपी जल से धूलकर चित्त के निर्मल होने पर अनायास ही सत्यरूप परमात्मा के दर्शन होते हैं। जगत् का सत्य तत्व परमात्मा समझते-समझते ही समझ मे आयेगा।
“सत्रु, मित्र, मध्यस्थ, तीनि ये, मन कीन्हें बरिआई।
त्यागन, गहन, उपेछ्नीय, अहि, हाटक तृनकी नाई।।”24
छः शास्त्र तथा चार वेदों का अध्ययन-मनन सामान्य लोगों के लिए दुष्कर है। कर्मकांड कलियुग में कठिन है और उसका होना भी धन के अधीन है। किन्तु जो राम नाम रूपी कल्पवृक्ष की छाया में बैठे हैं, उसे घनघोर घटा (तमोमय अज्ञान) अथवा तेज धूप (विषयों का चकाचौंध) से डर नहीं है। जैसे पपीहा कुआं, नदी, तालाब, और समुद्र के तट के जल की जरा सी भी आशा न कर केवल स्वाती-नक्षत्र के जल की एक प्रेम बूंद के लिए प्यासा रहता है वैसे सभी साधनों और फल की आशा न कर केवल राम नाम के प्रेम रूपी अमृत की बूंद में प्रीति करना चाहिए-
“सब साधन-फल कूप-सरित-सर,सागर-सलिल-निरासा।
रामनाम-रति-स्वाति-सुधा-सुबह-सीकर प्रेमपियासा।।”25
मुनियों के अनेक मत हैं (छः दर्शन) और पुराणों में नाना प्रकार के पंथ देखकर झगड़ा ही जान पड़ता है मेरे लिए राजमार्ग के समान राम भजन ही उत्तम है। संसार-सागर से तरने के लिए राम-नाम ही जहाज है-
“बहु मत मुनि बहु पंथ पुराननि जहाँ-तहाँ झगरो सो।
गुरु कह्यो राम-भजन नीको मोहिं लगत राज डगरो सो।।”26
परमात्मा के साथ द्वैत भाव मिटने पर अद्वैत के दर्शन होते हैं और जो अद्वैत का अनुभव कर लेता है ऐसी अवस्था में शोक, मोह, भय, हर्ष, दिन-रात और देश-काल नहीं रह जाते। आत्मस्वरूप प्राप्त जीव की दश विलक्षण हो जाती है। संतोष, समता, शांति और मन-इंद्रियों का निग्रह उसके स्वाभाविक हो जाते हैं फिर वह अपने को देहधारी नहीं मानता अर्थात् उसका देहात्म बोध चला जाता है। वह विशुद्ध संसार-रोग-रहित और एकरस हो जाता है। जो साक्षी भाव से निद्रा को त्यागकर ध्यान में रहता है वही परमानन्द की प्रत्यक्ष अनुभूति कर सकता है।
तुलसीदास का मानना है कि भक्ति के बिना ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती है। ब्रह्मामृत बड़ा ही मधुर और शांतिकर है यदि मन को यह अमृत जल पीने को मिल जाये तो विषयरूपी झूठे मृगजल के लिए क्यों दिन-रात भटकता फिरेगा। ज्ञान, भक्ति, आदि अनेक सच्चे साधन हैं परंतु तुलसीदास के अज्ञान का नाश केवल प्रभु कृपा से हो सकता है-
“ग्यान-भगति साधन अनेक, सब सत्य, झूठ कछु नहीं।
तुलसिदास हरी-कृपया मिटै भ्रम, यह भरोस मनमाहीं।।”27
संदर्भ ग्रन्थ:
1. नगेन्द्र, (2007) हिन्दी साहित्य का इतिहास, मयूर पेपरबैक्स, नोएडा, पृ.-87
2. शुक्ल, रामचन्द्र, हिन्दी साहित्य का इतिहास, कमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृ.-54
3. नगेन्द्र, (2007) हिन्दी साहित्य का इतिहास, मयूर पेपरबैक्स, नोएडा, पृ.-108
4. पोद्दार, हनुमान प्रसाद, (सं.2078), विनय पत्रिका, गीताप्रेस, गोरखपुर, पृ.-76
5. गौड़, ज्वाला प्रसाद(1984), सांख्यकारिका, चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी, पृ.-1
6. शर्मा, चंद्रधर,(1998) भारतीय दर्शन, आलोचल और अनुशीलन, मोतीलाल बनारसीदास पब्लिशर्स, दिल्ली, पृ.-1
7. पोद्दार, हनुमान प्रसाद, (सं.2078), विनय पत्रिका, गीताप्रेस, गोरखपुर, पृ.-141
8. वही , पृ.-153
9. वही , पृ.-170
10. वही , पृ.-195
11. वही , पृ.-57
12. वही , पृ.-72
13. वही , पृ.-76
14. वही , पृ.-78
15. वही , पृ.-75
16. वही , पृ.-143
17. वही , पृ.-101
18. वही , पृ.-199
19. वही , पृ.-167
20. वही , पृ.-180
21. वही , पृ.-301
22. वही , पृ.-102
23. वही , पृ.-64
24. वही , पृ.-156
25. वही , पृ.-99
26. वही , पृ.-219
27. वही , पृ.-148
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Received on 30.05.2025 Revised on 20.06.2025 Accepted on 18.07.2025 Published on 22.08.2025 Available online from September 05, 2025 Int. J. Ad. Social Sciences. 2025; 13(3):157-162. DOI: 10.52711/2454-2679.2025.00024 ©A and V Publications All right reserved
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